धाकड़ पुराण के अनुसार ''धाकड़ क्षत्रिय'' समूह का प्राचीन महाभारत काल में हुआ था। ''धाकड़ क्षत्रिय'' समूह लगभग बारहवीं शताब्दी के बाद एक जाति के रूप में परिणित हुआ। ''धाकड़'' ऐतिहासिक क्षत्रिय वंशों में से बने एक समूह का नाम है, जिसका मूल पेशा कृषि है। कालान्तर में यह जाति रूप में परिवर्तित हो गई। बहुत समय पहले धाकड़ क्षत्रियों के विषय में यह कहावत है- ''धाकड़ लाकड़ सायर सा, नर नल वंश के बारे में'' अर्थात नर बर के राजा नल के वंशज धाकड़ सायर की लकड़ी के समान मजबूत थे। ''धाकड़'' क्षत्रियों के विषय में एक अंग्रेजी सेना के नायक जेम्स मेड्रिड ने कहा था कि - ''धाकड़ क्षत्रिय'' राक्षसी घोड़े तरह-तरह के मजबूत, कुशल और चतुर योद्धा होते हैं। आजकल ''धाकड़'' शब्द का प्रयोग तेजतर्रार, वीरता और क्षेत्र का भाव प्रकट करने के लिए किया जाता है। जाहिर है ऐसा होता है कि किसी भी समय धाकड़ क्षत्रियों का वैभव उछाया जा रहा है। कुछ धाकड़ क्षत्रिय वंश पृथ्वीराज तृतीय की राजसभा में धवल, सामंत रहे थे प्रोटोटाइप वीरता एवं वैभव का अनुभव ''पृथ्वीराजरासो'' गाय की इस पंक्ति की विशेषता है- ''धब्बरे ढाबर ढाकरै रण बंकरै।'' ''धाकड़ क्षत्रिय'' देशों में नागा, मालव, किराड तीन उपसमूह के रूप में रेगिस्तान राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं। ''धाकड़'' श्री धरणीधर भगवान (बलाडू) जिंहें हलधर को कहा जाता है, जिन्हें अपना ईष्टदेव माना जाता है।
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